घुले मिले हाइक
1
पत्थर तोड़
चट्टानें को मात दे
फूटा अंकुर।
2
खेतों में बीज
किसानों से कहता
नदी से सींच।
3
गोधूलिबेला
रवि,धरा मिलन
क्षितिज पर।
4
करके जिद्द
मेघों से बारिश ले
लौटा सावन।
5
नदी किनारे
ज्यों फँस गयी कश्ती
मांझी पुकारे।
6
गायों को हांक
गावों की ओर चले
खेतों से ग्वाले।
7
पेडों पे आम
पत्थर से छलनी
लहूलुहान।
8
मुँह बनाये
छत से देखे, मैंने
दोनो ही चाँद।
9
उसकी खोरी
चक्कर काटे मैंने
ज्यों पृथ्वी कक्षा।
10
प्रेयसी स्पर्श
लगा मुझको जैसे
चाँद ने छुआ।
11
खेतों में देखा
चकवा-चकवी का
ढाई अक्षर।
12
माँगे विराम
बैठी, पेडों के नीचे
थक के नदी।
13
लिखी बहुत
नदी, पहाड़ व्यथा
अपनी छोड़।
14
प्रेयसी देख
खिला मन ऐसे, ज्यों
अरुणोदय।
15
गीदड़ बना
पिंजरे में ज्यों कैद
बब्बर शेर।
16
श्रावन मास
गरजे सौदामिनी
ज्यों रणभेरी।
17
मेघों में छुप
चाँद देखें तिरछा
अष्टमी बाद।
18
नदी को भेजी
बारिश के सहारे
स्नेह की चिट्ठी।
19
खोलता फ्रीज़
ऊपर से गगन
ज्यों गिरे ओले।
20
ठंड से बच
चुपके से ढलता
सर्दी में रवि।
21
रात का डर
अमावस्या के दिन
चाँद के बिन।
22
गाँव से चला
हवा का एक झोंका
मिट्टी में भीग।
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