प्रेम पर ताँका 1
1
श्यामल रात
निर्झरिणी बहती
प्रेम-मिलन
मधुरम् संगीत
सिंधु से गले मिली।
2
प्रेम में लीन
सदा ऐसे मिले, ज्यों
नदी सिंधु में
पूर्णतयः विलीन
उत्सुक साथ बहे।
3
दुःख या सुख
सदा साथ रहे, ज्यों
चाँद-चाँदनी
दुःख साथ काटते
सुख साथ बांटते।
4
खुली छत से
चाँद का मुँह टेढ़ा
साथ में देखा
सात सुर मिला के
प्रेम-कविता गा के।
5
क्यों बैठी प्रिये?
मुँह फेरें उदास
प्रणय-मास
एक उदास नदी
ज्यों ढूँढ रही सिंधु।
6
व्याकुल मन
ढूँढता प्रेम बाट
निर्झर आँख
आँसू का धर रूप
सिंधु को चिट्ठी भेजे।
7
पढ़ लो तुम
लहरों पर लिखी
प्रेम-कहानी
श्वेत पत्र भेजे ज्यों
पहाड़ों से हिमानी।
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